मंगलवार, 14 सितंबर 2010

जंग अभी जारी है

बात आई गयी हो चुकी है। अब तो कामनवेल्थ गेम्स भी करीब आ चुके हैं। इन खेलों की तैयारियों के बीच कई खेल खेले गए। किसी से कुछ छुपा नहीं है। आरोप लगे, मामला उछला और बहस भी छिड़ी। मगर, असली खेल को लेकर कोई ख़ास चिंता न तो ओर्गानिज़िंग कमिटी में दिखी और न ही इस 'खेल' से दुनिया भर में हुई हिन्दुस्तानियों की किरकिरी की किसी को फिक्र थी। हो भी क्यों? इस तरह के खेल तो यहाँ के सिस्टम की आदत में शुमार हो चला है। कोई काम करना हो तो बगैर लिए-दिए कुछ नहीं होता। आम जरुरत के काम से लेकर सुरक्षा के मामलों में भी रिश्वत का घुन लग चुका है। देश में भूचाल लाने वाला बोफोर्स का मामला तो आप सभी को याद ही होगा। बिहार का चारा घोटाला भी आप नहीं भूले होंगे। करप्शन से घिरे इस सिस्टम में तो अब इसे अनिवार्य मान लिया गया है। बावजूद इसके हर भारतीय के मन में एक टीस उठती है। इस टीस के साथ अफ़सोस इस बात का भी है कि इस करप्ट सिस्टम को पालने-पोसने का काम भी हमारे और आपके बीच के लोग ही कर रहे हैं। क्या अपने जरुरी औए जायज काम के लिए कि जेब गर्म करना जरुरी है। उनके लिए भी जो इस 'सिस्टम' को नहीं स्वीकारते और उनके लिए भी जिन्हें ऐसा करना कतई गंवारा नहीं। किस तरह से आईओसी के इंजिनियर एस मंजुनाथ की गोली मार कर हत्या कर दी गयी। महज इसलिए कि इस इमानदार इंजिनियर ने पेट्रोल पम्प मालिक की धांधलियों को गलत ठहराया था। इसी तरह बिहार में सत्येन्द्र दुबे का मर्डर कर दिया गया। उसका कसूर बस इतना था कि वह नॅशनल हाईवे अथोरिटी के लिए टेंडर डालने वालों को खटक रहा था। इस ईमानदार शख्स ने पीएम्ओ तक इसकी शिकायत की थी। करप्शन के खिलाफ उसकी लड़ाई का नतीजा बेहद दर्दनाक रहा। कितने ही मंजुनाथ और सत्येन्द्र आज भी इस करप्शन को सपोर्ट करने से इनकार करते आ रहे हैं, लेकिन उनका साथ देने वाले इस सिस्टम में कहीं नजर नहीं आते। इसलिए उनके लिए ऐसी घटनाएं कभी कोई मायने नहीं रखतीं और उनके लिए यह कोई नयी बात नहीं है। फिर उनके पास मजबूरी भी है कि आखिर वे किस-किस के खिलाफ कार्रवाई करते घूमेंगे। भाई, हमाम में तो सभी नंगे हैं।

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