यूं तो ताउम्र मय ओ मीना में डूबा रहा हूं मैं अब भाती नहीं महफिल और चश्म ए मीना तेरे बगैर।
चंद अल्फाजों में वो तौलते रहे चाहतों की जुंबिश इस दिल की गहराई में गोया कई नक्काद डूब गये।
मुलाकात हुई, न हुई
देखा उसे, मिला भी मगर बात हुई, न हुई। शबे-रोज उम्मीदों की कायनात हुई, न हुई। जगता और तकता रहा बस यूं ही इन ख्वाब ओ ख्यालों की रात हुई, न हुई। जेब में रखे रहे तमाम इजहार ए इश्क के खत कमबख्त हर बार मुलाकात हुई, न हुई।
खुद से खफा हूं मैं
जिंदगी के इस मुकाम पर पहली दफा हूं मैं। सच कहूं खुद अपने आप से खफा हूं मैं। जो गल्तियां मुझसे हुईं वो तू तो न कर इस ईमान ए दिल का एक फलसफा हूं मैं।
दिल को भी कोई नया काम चाहिए
बेकरारी से मुख्तलिफ एक सुबह एक शाम चाहिए। इस तडपते दिल को भी कोई नया काम चाहिए। न तुम्हे है फुरसत न मुझे है आराम मेरे दोस्त तुम भी हो मेरे लिए बेचैन,बस ये पैगाम चाहिए। इस सौदायी दुनिया में चाहतों का भी लगता है मोल लुट जाउंगा एक मुस्कुराहट पे नहीं कोई दाम चाहिए। अब ये मय ओ मीना भी महफिल में सुरुर नहीं भरती तेरे चश्म ए मय सा सुकून दे बस वो जाम चाहिए।
दर्द और दिल का पुराना रिश्ता है
कातिल से अब उसका चेहरा मिलता है। जख्म रिसता है तो हौसला मिलता है। उसकी उल्फत, उसकी वफा का आलम न पूछ न जाने किससे वो इतने फरेब सिखता है। जान लेने के बाद कत्ल करने की उसकी अदा चेहरे पर न जा वो बडा मासूम दिखता है। आज भी मिलता है वो मुझसे यूं ही अक्सर दर्द और दिल का तो ये पुराना रिश्ता है।
आसां नहीं है अशियाना बनाना
चंद ईंटें जोडी और बस गारा साना। इतना भी आसां नहीं है अशियाना बनाना। कुछ राख होते हैं, कुछ खाक होते हैं सपनों को हम यूं ही दिन रात ढोते हैं फकत यही है इन मुश्किलों का फसाना चंद ईंटें जोडी और बस गारा साना। इतना भी आसां नहीं है आशियाना बनाना। कभी अपनों के दरमियां दीवार खींचती है कभी अपने ही घर की दीवार दरकती है इंसानी दुनिया में शैतानी आग दहकती है चाहती हैं उम्मीदों का मकान जलाना। चंद ईंटें जोडी और गारा साना। इतना भी आसां नहीं है आशियाना बनाना।